भोयर इतिहास संस्मरण काव्य
सूर्य-चंद्र ऋषी अग्नि ,यह वंश मिले जब आपस में।
भारतवर्ष के महान वंश का, उदय हुआ इस माटी में।।
मिलकर उठी तलवार सहस्त्रो, जब राजरक्त ये एक हुए।
इतिहास गवाह है भीड़ के इनसे, शत्रु के पसीने छूट गए।।
स्वाभिमान निजधर्म रक्षा में, जब जाते थे मर मिटने को।
रणचंडीका होती थी प्रसन्न और हर्ष होता रणभूमि को।।
जब यवनों द्वारा पराजय ने, हमको नर्मदा नदी लघायी थी।
कर विसर्जित जनेऊ वहां, जीने को खेती अपनाई थी।।
राजपाठ कों राजवैभव को, था उन्होंने त्याग दिया,
पर भीतर के राजरक्तने, सोये पौरुष को जगा दिया।।
दक्षिण में जब वीर शिवा ने, शुरू स्वराज का यज्ञ किया।
रख कर कुछ को पीछे तब, इन वीरों ने वहां स्थान लिया।।
परमार शेरो से छत्रपति को, वीरतापुर्ण योगदान मिला।शिवछत्रपती ने शंभू सिंह को, विश्वास राव का मान दिया।।
तबसे अनेकों महावीर, लगातार लड़े फिर मुघलों से।
अनेकों पीढ़ियां योद्धा हुई, इन बलवान 72 कुलो से।।
वीर पेशवा बाजीराव ने, जब उत्तर का अभियान किया।मुघलों को हराया पवारो ने और वापस धार-देवास लिया।।
तब उत्तर में मराठा सत्ता का, सफल महाविस्तार हुआ।तीसरा पानीपत युद्ध हुआ, फिर वीरों का संहार हुआ।।
हिल गई जड़े भारत भूमि की, फिर अंग्रेजी युग आया।अब बतलाता हूं मै आपको, के भाग्य में हमारे क्या आया।।
स्वाभिमानी पवारो पर जब, फिरंगीयो का ध्यान गया।स्वाभिमान से होकर चोटील, गोरोने उन्हें अपमान दिया।।
पुस्तकों में अपने उन्होंने, पवारो के मान को गिरा दिया। कही निम्न कृषक तो कहीं भगोड़े राजपूत का दाग दिया।।
वह कहते हैं १७वी सदी में, छिनने को धार मुघल आये।
हम कर रहे थे दुर्ग की रक्षा और वहीं से हम भाग आए।।
ऐसा झुठ फैलाया लिखकर, पवार कमजोर और कायर है।
किले से भागे भोर समय इसकारण कहलाते भोयर है।।
एक बात ना समझ सके, सत्य कभी भी छूपता नहीं।
कितनी हो लंबी रात पर, सूर्योदय कभी भी रुकता नहीं।।
सदी १५वी से १८वी तक, मालवा पर छाई मुघलाई थी।
तब कैसे हम मान ले के, मुघलों की मुघलों से लड़ाई थी।।
मन में वैभव के प्रश्न उठा, हम तो 14वीं सदी में आए थे।
तब हम सदी १७वी में, किसकी रक्षा का भार उठाए थे।।
इसप्रकार से फिरंगीयोने, सम्मान को हमारे कलंक दिया।
पर कैसे क्षमा करु जिन्होंने, यह कलंक भी है अपना लिया।।
माथे के हमारे इस कलंकने, हमें बहुत अधिक ही गिरा दिया।
कहके भगोड़ा हमको को उन्होंने, राजपुतो से दुर ही करा दिया।।
बड़े वीर बलिदानी हुए, तब तलवार चलाई बच्चों ने।मर्यादा के खातिर वीरचीता पर, काया जलायी सतीयोने।।
ऐसे वीरो की संतान है हम, पर इतिहास से हम भुलाये है।
राजा भोज से हमारा है परिचय, तभी भोजर कहलाये है।।
उठो पवारो जागो नींद से, निजकर्तव्य को पुर्ण करो।
पोछो माथे से इस कलंक को, बलिदान पुरखोंका सार्थ करो।।
कहते हैं कनक को रखो कैसे भी, वह मुल्यवान ही होता है।
राजा का बच्चा चाहे हो जैसा भी वह राजपुत्र ही कहलाता है... वह राजपुत्र ही कहलाता है..... वह राजपुत्र ही कहलाता है।।
--- वैभव यादवराव पाठे
न्यु येरखेडा, ता. कामठी, जि. नागपूर
Comments
Post a Comment